रविवार, 26 अप्रैल 2015

Gajendra Singh Rajput

An elegy for Gajendra Singh Rajput: How many farmers really commit suicide?

by Javed Iqbal
Gajendra Singh Rajput’s death is the atrocity of the week in an age of atrocities. A man standing high above a crowd, is soon hanging from a tree branch, whether suicide or accident. If he truly did wish to die, I wonder what he felt in those last few moments of his life, what he thought as he saw a sea of people under him, some jeering, some asking him to come down: did he feel he was truly and finally alone? Did he feel at peace at the knowledge that it would be no more? Yet like all farmers in a mainstream discourse, he is first a victim, and his death, is now a very public suicide in a sea of silent suicides.
As victims, do farmers become helpless and hapless or can the farmer rebel? In the mainstream perception, farmers are not meant to stand up and fight back against systematic structural violence.
Farmer Gajendra Singh falls from the tree during AAP's anti-land bill rally. PTI
Farmer Gajendra Singh falls from the tree during AAP's anti-land bill rally. PTI
So how many farmers committed suicide standing in front of the bullets fired by the police on 2 January, 2006, when they were protesting against the Tata’s industrial corridor at Kalinganagar, Odisha? Or at Nandigram, Singur, or Bhatta Parsaul just a few years ago? Or at Forbesganj in Bihar on the 2 July, 2010, protesting against the blocking of their road by a private company? Or at Sompeta in Andhra Pradesh when they (fishermen/fisherwomen, not just farmers) committed suicide standing in front of more police bullets, protesting against a thermal power plant? How many farmers committed suicide in Bihar in the 1980’s and 1990’s when the Ranvir Senas of the world came and murdered them at Bathani Tola or Laxmanpur-Bathe, after they stood up for their land rights? How many of them committed suicide again when they went to the courts and had to watch their Bhumihar murderers get acquitted by the courts?
How many farmers committed suicide on this year’s Ambedkar Jayanti by standing in front of police bullets at Kanhar Valley, Sonbhadra, Uttar Pradesh, protesting against the Kanhar dam? And again when they were fired upon four days later? Well, the police chased away the media and the human rights activists from there. And then there are those pesky farmers committing suicide again by submerging themselves in rising waters as a protest against the whole Narmada nonsense at Omkareshwar, which has gone on for too long anyway.
How many farmers, I mean labourers, I mean farm-labourers, I mean Dalits, I mean Maha-dalits, I mean Dalit farmers, I mean people who want land to survive/sustain themselves, commit suicide when they stand up to the landed castes? How many farmers are murdered by other farmers of dominant castes when they merely stand up for their dignity? When they fight for their land, their identity, their right to equality?
How many farmers, I mean Adivasis, I mean Adivasi farmers, have committed suicide by protesting against private corporations and public mining companies since independence?
How many Adivasi farmers committed suicide by jumping in front of the railway tracks leading to Rourkela, Odisha on 20 January, 2015, protesting against losing their Adivasi rights (PESA) to the forcible establishment of the Rourkela Municipal Corporation? Those adivasis stopped a train actually, the train committed suicide there. These adivasis farmers of Sundergarh committed suicide by blockading the entire steel town of Rourkela, for they certainly didn’t want to die, or to give up, they wanted the state to stop and listen, they wanted the courts to pay attention.
How many farmers whose homes and grains were burnt down by the police and the Salwa Judum in Bastar, Chhattisgarh since 2004 have committed suicide by joining the CPI Maoist party? How many farmers have committed suicide by being tortured by the police for information about the above mentioned ‘rebels’? How many farmers have committed suicide by their protest when the administration called them ‘Maoist’ just because they had said no to the state’s idea of development? And how many sons of farmers have committed suicide by joining the CRPF and fighting an insurgency which is not their war?
Did Dasrath Majhi commit suicide by chiseling through a mountain so his village could have access to a hospital? How many farmers commit suicide during childbirth thanks to inadequate healthcare infrastructure with further thanks to a budget allocation that doesn’t focus on public healhcare? How many sons and daughters of farmers commit suicide by dying of malnutrition, thanks to the fact that there still isn’t a universal public distribution system?
How many farmers commit suicide when they argue sustainability and environment, against industrial development and mining, with the free market economists who don’t listen? How many farmers fought and protested against debt and GM crops, before they committed suicide?
So really, how many farmers really commit suicide by fighting back? How many farmers refuse to be victims?
No, no farmer ever commits suicide.
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रविवार, 14 अप्रैल 2013

अमर सिंह की तल्खी -

'आजम के इशारे पर उतारी जया की कार की लाल बत्ती'

लखनऊ/ब्यूरो | Last updated on: April 15, 2013 12:23 AM IST
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officials behaved in
सांसद जयाप्रदा की गाड़ी से लालबत्ती उतारे जाने से तमतमाए सांसद अमर सिंह ने कहा है कि यह कार्रवाई संसदीय कार्यमंत्री आजम खां के इशारे पर की गई है।

उन्होंने आजम की मंत्रिमंडल से बर्खास्तगी की मांग करते हुए कहा कि जब तक वह मंत्रिमंडल में रहेंगे, महिलाओं के साथ बदसलूकी नहीं रुक सकती।

उन्होंने लालबत्ती उतारने के दौरान वहां के एआरटीओ कौशलेंद्र यादव पर सांसद के साथ दुर्व्यवहार का आरोप लगाते हुए मुख्य सचिव से उन्हें निलंबित कर कड़ी कार्रवाई की मांग की। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि तीन दिन में इन पर कार्रवाई नहीं हुई तो जयाप्रदा हाईकोर्ट जाएंगी।

अमर सिंह गोमतीनगर स्थित अपने आवास पर पत्रकारों से बात कर रहे थे। सिंह ने कहा कि उन्होंने गुर्दाविहीन शरीर से इस पार्टी की सेवा की। जब मुलायम सिंह के साथ कोई नहीं था, तब संजय दत्त की सभाएं करवाता रहा। तब आजम खां मुलायम को भला-बुरा कहते थे। बाद में आजम खां को पार्टी में ले लिया गया और उन्हें निकाल दिया गया। आज आजम खां उस संजय दत्त को जेल भेजे जाने की वकालत कर रहे हैं।

सिंह ने कहा कि उनके सपा से निकाले जाने के बाद जयाप्रदा उनके साथ बनी रहीं जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार यदि महिला आईएएस अफसर और अभिनेत्री हेमामालिनी व श्रीदेवी की खूबसूरती पर टिप्पणी के लिए एक कैबिनेट मंत्री को बर्खास्त कर सकती है तो उसे महिला सांसद के साथ मर्यादाविहीन आचरण कराने वाले मंत्री आजम खां को तत्काल बर्खास्त करना चाहिए।

मायावती और सुषमा से मिलकर मदद मांगेंगी
अमर सिंह ने कहा कि जयाप्रदा के साथ उसी तरह दुर्व्यवहार हुआ जैसा कि बसपा अध्यक्ष मायावती के साथ गेस्टहाउस कांड में हुआ था। उन्होंने कहा कि जयाप्रदा मायावती और सुषमा स्वराज से मिलकर मदद मांगेंगी। केंद्रीय महिला आयोग तो जाएंगी ही, लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार से मिलकर विशेषाधिकार हनन का नोटिस भी देंगी। इसके अलावा मामले को राष्ट्रपति तक ले जाया जाएगा।

मुलायम सिंह को भी निशाने पर लिया
अमर सिंह ने कहा कि जयाप्रदा मुलायम को पिता और अखिलेश को भाई कहती हैं। एक भाई तो बहन के लिए कुछ भी कर सकता है, क्या सीएम इस पर कार्रवाई कर पाएंगे। उन्होंने सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव का नाम लेते हुए कहा कि यदि उनकी बहू के साथ इस तरह का दुर्व्यवहार होता तो उन्हें कैसा लगता? मगर वे चुप्पी साधे रहेंगे। अमर सिंह ने कहा कि उन्होंने जयाप्रदा को किसी भी दल में जाने के लिए छूट दे दी है।

हो सकता है कल मुझे सपा दलाल कहने लगे
सांसद अमर सिंह ने कहा कि जयाप्रदा के लिए आवाज उठाने पर हो सकता है सपा के नेता उन्हें दलाल, सप्लायर, कूड़ेदान, बेशर्म, धोखेबाज, कमीना, बेईमान कहने लगें। मगर मैं यह कहना चाहता हूं कि जो भी था, मुलायम सिंह के लिए ही था। वह ऐसा सुनते-सुनते थक चुके हैं। बेनी और उनकी मुलाकात से जुड़ा सवाल हुआ तो सिंह ने कहा कि दो सताए हुए मिलते हैं तो हाय-हाय ही करेंगे। अपने मन की बात कहने के लिए उन्होंने पार्टी बनाई थी। उन्होंने यह कभी नहीं सोचा कि वह कल्याण सिंह से बड़े नेता हैं, इसका भ्रम कभी नहीं रहा।

नरेश जयाप्रदा के पक्ष में
सांसद जयाप्रदा की गाड़ी से लालबत्ती उतारे जाने के मामले में सपा सांसद नरेश अग्रवाल उनके पक्ष में बोले। अग्रवाल ने कहा कि सांसद की गाड़ी से लालबत्ती उतारा जाना गलत है। प्रदेश में यदि किसी ने ऐसा किया है तो गलत किया। ऐसा करने वाले के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। नरेश के इस बयान को सपा में चल रही अंदरुनी खींचतान से जोड़कर देखा जा रहा है।
नोट-
अमर सिंह जी आपको रोना खूब आता है जब आप सपा में थे तब आप ऐसे तैसों को ही सपा का सांसद बनाया करते थे क्या उत्तर प्रदेश में महिलायें नहीं थीं यही थीं जिन्हें संसद में भेजना था, मुलायम की ही कुवत थी की आप को नेता होने की गलत फहमी हो गयी थी अन्यथा तो आपका असली पेशा 'दलाली ही है' और आगे भी यही करिए इससे ज्यादा आपको कहीं जगह नहीं मिलनी है. 

मंगलवार, 5 जून 2012


लूट की छूट और उत्तर प्रदेश की दलित राजनीती 

खास दरबारी ही बने अंटू की मुसीबत
Jun 05, 07:54 pm
लखनऊ [आनन्द राय]। पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अनंत कुमार मिश्र उर्फ अंटू मिश्र एनआरएचएम घोटाले की जांच के शुरुआती दौर से ही सीबीआइ की हिट लिस्ट में रहे, लेकिन उनके खास दरबारियों ने उनकी मुसीबत और बढ़ा दी। जांच के गति पकड़ते ही अंटू के चहेते ठेकेदार उनका कच्चा चिट्ठा खोलने लगे। उन्होंने जिन सीएमओ को अपना समझकर मलाईदार जिलों में तैनाती दी वह भी उनका राज छुपा न सके।
सूत्रों के मुताबिक सीबीआइ अब एनआरएचएम घोटाले में अंटू मिश्र को चौतरफा घेर चुकी है। जांच की शुरुआत में अंटू के खिलाफ सबसे पहले पूर्व परिवार कल्याण मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा ने जुबान खोली थी, लेकिन तब सीबीआइ के पास अंटू के खिलाफ कोई सबूत नहीं था। अंटू को शिकंजे में लेने के लिए सीबीआइ ने उनके खास सीएमओ और चहेते ठेकेदारों की सूची तैयार की और फरवरी के आखिरी हफ्ते में छापेमारी की। तब कुछ सीएमओ मौके से भाग गये, लेकिन जो पकड़ में आये, उन्होंने सीबीआइ को एनआरएचएम की दास्तां सुनाई और सबने अंटू के ही सिर घोटाले का ठीकरा फोड़ा। इनमें कई सीएमओ ने बाबू सिंह की भी करतूतें बताई।
उल्लेखनीय है कि वाराणसी में सीएमओ रहे डाक्टर आरएस वर्मा, बस्ती में डॉ जीपी वर्मा, गोरखपुर में डॉ आरएन मिश्र, मेरठ में डाक्टर प्रेमप्रकाश, वाराणसी में संयुक्त निदेशक डॉ आरएन यादव, श्रावस्ती के सीएमओ डॉ सी प्रकाश, कई जिलों में सीएमओ रहे पटना निवासी डाक्टर विभूति प्रसाद, कन्नौज में एसीएमओ डाक्टर हरिश्चंद्र, सीनियर कंसलटेंट पैथोलॉजी गोरखपुर डाक्टर सिलोइया, बहराइच के डॉ हरि प्रकाश, गोंडा में एसीएमओ डॉ एके श्रीवास्तव, डॉ एसपी पाठक और वाराणसी में रह रहे बलिया के सीएमओ पद से सेवानिवृत्त केएम तिवारी जैसे कई मौजूदा और पूर्व सीएमओ थे, जिनकी पकड़ या तो बिचौलियों के जरिए या सीधे अंटू मिश्र तक थी। यह सभी लोग अंटू के यहां नियमित दरबार लगाते थे और इन सबके माडल लखनऊ के तत्कालीन सीएमओ डाक्टर एके शुक्ला थे। सीबीआइ ने फरवरी में जब इनके यहां एक साथ छापेमारी की तो कई लोग टूट गये। इन लोगों ने ही घोटाले के तौर तरीकों से लेकर हिस्सेदारों तक के नाम बताये। डाक्टर एके शुक्ला ने तो अंटू पर आरोपों की झड़ी लगा दी थी। इस बीच अंटू के खास बिचौलिए वाराणसी के दवा कारोबारी महेंद्र पाण्डेय और 18 जिलों में दवा का काम करने वाले रइस अहमद उर्फ गुड्डू खान का नाम उजागर हुआ, जिनकी संस्तुति पर सीएमओ 15 से 20 लाख रुपये में तैनात किये जाते थे। सीबीआइ ने महेंद्र एवं गुड्डू की भी घेरेबंदी कर दी। तैनाती के बदले में दवा खरीद में लाभ पहुंचाने, फर्जी बिलों को स्वीकृति देने, दवाओं का ठेका दिलवाने में इन सबने पाण्डेय, गुड्डू खान और उनके करीबियों को लाभ मिलने की बात भी सामने आ गई।
कुशवाहा ने बनाया एक और गुट :
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय का बंटवारा हुआ तो कुशवाहा ने विधायक रामप्रसाद जायसवाल के नेतृत्व में एक बड़ा गुट खड़ा कर दिया। सर्जिकान मेडिक्वीप के एमडी गिरीश मलिक, सौरभ जैन, गुडडू खान, नरेश ग्रोवर, आरके सिंह और अधिकारियों की एक टीम काम करने लगी। इनके अलावा परदे के पीछे और भी बहुत से लोग सहायक बने। मेरठ में सीएमओ परिवार कल्याण रहे पीपी वर्मा समेत और कई सीएमओ उनके करीब हो गये। अंटू के करीबी सीएमओ ने भी उनसे रिश्ते बना लिए। बताते हैं कि बाद के दिनों में घोटाले में बाबू सिंह का वर्चस्व बढ़ गया। कुशवाहा ने महेंद्र पाण्डेय के प्रतिस्पर्धी मानवेंद्र को भी उभारा।
तैनाती का कनेक्शन तलाश रही सीबीआइ :
सीबीआइ एनआरएचएम घोटाले के दौरान सूबे में तैनात होने वाले सीएमओ और उनको तैनाती दिलाने वाले बिचौलियों का भी कनेक्शन तलाश रही है। सीबीआइ को यह जानकारी मिली है कि कई ऐसे सीएमओ थे जो खुद अपने सहयोगियों और साथियों की पोस्टिंग कराते थे। इन सीएमओ के बारे में सीबीआइ को यह भी खबर है कि मंत्री अंटू मिश्र और कुशवाहा की गैर जानकारी में भी यह घोटाला करके रकम हड़पते थे। इनकी शीघ्र गिरफ्तारी हो सकती है।
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अखिलेश जी के पास अन्टू जैसे लोग कहाँ !
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बुधवार, 23 मई 2012

पत्रकार

ये कैसे कैसे पत्रकार -

(दैनिक  जागरण  की इस  खबर को देखिये खबर और और  चित्र  कहीं का .)

पूर्व प्रधान की हत्या मामले में छह गिरफ्तार

May 23, 07:54 pm
हापुड़, जागरण संवाद केंद्र : दस दिन पहले किठौर रोड पर हुई अतराड़ा के पूर्व प्रधान राकेश त्यागी की हत्या का पुलिस ने बुधवार को खुलासा कर दिया। पुलिस ने छह हत्यारोपियों को गिरफ्तार कर उनके कब्जे से हत्या में प्रयुक्त एक पिस्टल व एक बंदूक के अलावा दो कार भी बरामद की है। राकेश की हत्या पुरानी रंजिश और अपना वर्चस्व कायम करने के लिए की गई थी। इसी रंजिश में मृतक के एक भाई विरेंद्र की छह वर्ष पहले हत्या कर दी गई थी।
गौरतलब है कि अतराड़ा की प्रधान कुसुम त्यागी के पति देवेंद्र पहलवान के भाई और पूर्व प्रधान राकेश त्यागी की कार सवार चार बदमाशों ने किठौर रोड स्थित शिवम कोल्ड स्टोरेज के पास उस समय हत्या कर दी थी। जब वह 13 मई की तड़के साढ़े पांच बजे अपनी मोटरसाइकिल से गांव लौट रहा था। राकेश मेरठ रोड स्थित चामुंडा पेपर मिल में सुपरवाइजर के रूप में कार्यरत था। बदमाश उसकी लाइसेंसी रिवाल्वर भी लूटकर ले गए थे। बुधवार को पुलिस अधीक्षक अब्दुल हमीद ने हत्याकांड का खुलासा करते हुए बताया कि इस मामले में रवि गुर्जर पुत्र जगदीश निवासी गोहरा, दिनेश शर्मा पुत्र मेघनाथ निवासी बवनपुरा खरखौदा, चंद्रप्रकाश त्यागी पुत्र नंदकिशोर व उसके पुत्र अतुल त्यागी, ओमकार निवासी मुरादपुर गजरौला, लाला उर्फ मेहर सिंह निवासी हिम्मतपुर सिंभावली को गिरफ्तार किया गया है। उनके कब्जे से हत्या में प्रयुक्त एक पिस्टल, एक दोनाली बंदूक, कारतूस तथा वैगनआर कार संख्या डीएल 8 सीएनबी 5343 व एक स्कार्पियो कार संख्या यूपी 16 जेड 4019 के अलावा साढ़े 34 हजार रुपये बरामद किए गए है। एसपी के अनुसार राकेश त्यागी की हत्या की योजना अजराड़ा निवासी इंतजार के यहां तैयार की गई थी, जिसमें असौड़ा निवासी रिफाकत भी शामिल था। घटना को अंजाम देने के लिए इंतजार ने शूटरों को तीन लाख रुपये देने का वादा किया, जिसके बाद 12 मई को रिफाकत ने रवि को फोन पर सूचना दी कि राकेश फैक्ट्री में नाइट ड्यूटी पर है और 13 मई की सुबह पांच से छह बजे के बीच मोटरसाइकिल से घर वापस जाएगा। इसके चलते वैगनआर कार में सवार रवि, संजय गुर्जर, फिरोज व राजकुमार त्यागी ने फैक्ट्री से निकलते ही राकेश का पीछा शुरू कर दिया और किठौर रोड पर उसे घेरकर ताबड़तोड़ गोली बरसाकर उसकी हत्या कर दी। इस मामले में रिफाकत के अलावा दिनेश पंडित व अतुल त्यागी ने भी राकेश की रेकी की। हत्या के बाद हमलावर राकेश की मौत की पुष्टि कर उसकी लाइसेंसी रिवाल्वर भी अपने साथ ले गए थे। इस रिवाल्वर को पुलिस अभी तक बरामद नहीं कर पाई है। एसपी ने बताया कि हत्या में प्रयुक्त कार सात मई को दिल्ली के अपोलो अस्पताल के बाहर से चोरी की गई थी। इस हत्याकांड को खुलासा करने वाली टीम को पुलिस अधीक्षक ने पांच हजार रुपये पुरस्कार देने की घोषणा की है। गौरतलब है कि राकेश के छोटे भाई विरेंद्र त्यागी उर्फ बबली की भी 17 अप्रैल 2006 को आवास विकास कालोनी में दिन निकलते ही गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में भी चंद्रप्रकाश त्यागी व रवि गुर्जर आरोपी हैं। इस हत्याकांड में रवि के अलावा उसके दो भाई संतरपाल और नीरज भी शामिल थे। पुलिस के अनुसार संतरपाल और नीरज इस हत्याकांड की साजिश में भी शामिल हैं लेकिन खुद को बचाने के लिए वह हत्या से एक दिन पहले ही एक मामले में जमानत रद कराकर जेल चले गए थे। हालांकि बाद में उन्होंने फिर से अपनी जमानत करा ली।

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

खुले आम खतरे.......

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मऊ में 4 घंटे से ज्यादा चली मुठभेड़, कोतवाल शहीद

सरसेना (मऊ)/अमर उजाला ब्यूरो
Story Update : Thursday, April 19, 2012    12:51 AM
Mau the encounter police killed
जिले के चिरैयाकोट थाना क्षेत्र के मठिया गांव के एक घर में छिपे बदमाशों के साथ बुधवार सुबह चार घंटे से अधिक चली मुठभेड़ में शहर कोतवाल शहीद हो गए, जबकि पुलिस ने भाग रहे दो बदमाशों का पीछाकर मार गिराया।

दोनों बदमाश खुद को बचने के लिए जिस घर में घुसे थे, उस परिवार को बंधक बना लिया और पुलिस पर गोलियां बरसाते रहे। इसी दौरान बदमाशों ने गृहस्वामी की हत्या कर दी। बदमाशों में एक धीरज सिंह कुछ समय पहले गोरखपुर स्टेशन से पुलिस कस्टडी से फरार हो गया था। दूसरा बदमाश विकास भी गोरखपुर का रहने वाला है।

जानकारी के अनुसार महराजगंज कारागार में निरुद्ध धीरज सिंह पुत्र इंद्रदेव सिंह उर्फ मुख्तार सिंह निवासी मझनपुर, गाजीपुर मार्च में मऊ से पेशी के बाद महराजगंज लौटते समय गोरखपुर स्टेशन से फरार हो गया था। 16 मार्च को एडीजी रेलवे लखनऊ ने उस पर 15 हजार का इनाम घोषित किया था। उसे पकड़ने के लिए कई थानों की पुलिस लगी हुई थी।

बुधवार दिन में दो बजे जैसे ही शहर कोतवाल गोविंद सिंह और एसओजी प्रभारी रामनरेश यादव को सर्विलांस पर सूचना मिली कि धीरज अपने साथी विकास के साथ चिरैयाकोट थाना क्षेत्र के सरसेना गांव में छिपे हैं, पुलिस मौके पर पहुंच गई। बदमाश बाइक से भागने लगे। पुलिस फिल्मी स्टाइल में बदमाशों के पीछे लग गई। दोनों बदमाश भागते हुए अवस्था इब्राहिम उर्फ मठिया पुरवे गांव में रामजी बरनवाल के घर में घुस गए।

शहर कोतवाल गोविंद सिंह पीछा करते हुए पुलिस टीम के साथ बरनवाल के घर पर पहुंच गए और बदमाशों को बाहर निकालने के लिए ललकारा। इतने में बदमाशों ने मकान मालिक और उनके बच्चों को बंधक बनाकर फायर झोंकना शुुरू कर दिया। इस दौरान गोली लगने से शहर कोतवाल गोविंद सिंह की मौत हो गई, पर सिपाहियों ने मोर्चा संभाले रखा। खबर आला अधिकारियों तक पहुंची तो आसपास के जिलों की फोर्स मौके पर पहुंच गई।

एसपी जोगेंद्र कुमार ने खुद कमान संभाल ली। पांच घंटे तक चली मुठभेड़ के बाद भाग रहे दोनों बदमाश मार गिराए गए। इससे पहले बदमाशों ने मकान मालिक रामजी की गोली मारकर हत्या कर दी थी। मुठभेड़ में एक सिपाही भी घायल हो गया। बदमाश रामजी के परिवार को बंधक बनाकर घटना को अंजाम दे रहे थे।

शहीद इंस्पेक्टर को सरकार देगी दस लाख
पुलिस और बदमाशों के बीच हुई मुठभेड़ में शहीद इंस्पेक्टर गोविंद सिंह को सरकार दस लाख की अनुग्रह राशि देगी। इसके अलावा बदमाशों ने जिस परिवार को बंधक बनाया था, उस परिवार के मुुखिया की मौत हो जाने पर दो लाख की अनुग्रह राशि दी जाएगी। मुठभेड़ में शामिल पुलिस बल को भी सम्मानित किया जाएगा। मऊ केमठिया गांव में पुलिस की एसओजी टीम की बुधवार को बदमाशों से मुठभेड़ हो गई।

बदमाशों ने पास के ही एक घर को बंधक बना लिया था। चार घंटे से अधिक देर तक चली मुठभेड़ में मऊ के सदर कोतवाल गोविन्द सिंह की गोली लगने से मौत हो गई। वहीं बदमाशों ने बंधक परिवार केमुखिया राम जी गुप्ता को भी गोली मार दी। इसकेबाद उनकी भी मौत हो गई। बदमाश इतने दुर्दांत थे कि उन्हें मारने के लिए पुलिस को वाराणसी से स्पेशल कमांडो की टीम भेजनी पड़ी। इसके बाद टीम ने बदमाशों को ढेर कर दिया। बदमाशों की पहचान गोरखपुर के धीरज सिंह और विकास सिंह के रूप में की गई।

शनिवार, 14 अप्रैल 2012


दलित महापुरुषों के नाम पर हुआ घोटाला

Apr 14, 11:25 pm
लखनऊ [जाब्यू]। अम्बेडकर जयंती के मौके पर मायावती की ललकार के बाद समाजवादी पार्टी ने भी आक्रामक रवैया अपना लिया। कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव ने आनन-फानन में घोषणा कर दी कि बसपा सरकार में दलित महापुरुषों के नाम पर उत्तर प्रदेश में बड़ा घोटाला हुआ है, जिसकी जांच कराई जाएगी। उनकी इसी घोषणा के बाद पार्टी भी सक्रिय हो गई।
पार्टी प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी की ओर से बयान जारी किया गया, जिसमें कहा गया है कि बसपाराज में 50 हजार करोड़ से ज्यादा पत्थरों पर बर्बाद हुए हैं। मायावती व कांशीराम की मूर्तियों पर छह करोड़ 68 लाख और 60 हाथियों पर 52 करोड़ रूपये खर्च किया गया है। मायावती को बताना होगा कि इससे दलितों का किस प्रकार उद्धार हुआ है। सरकार ने मायाराज के कारनामों की जांच के आदेश दिए हैं और इनमें दोषी पाएं जाने पर सख्त कार्यवाही के भी संकेत दे दिए हैं। पार्टी प्रवक्ता ने कहा कि रही बात धमकी की तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने स्पष्ट चेतावनी भी दी है कि प्रदेश की कानून व्यवस्था से किसी को खिलवाड़ नहीं करने दिया जाएगा और यदि किसी ने शांति भंग की तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी।
प्रवक्ता ने कहा कि जनता की गाढ़ी कमाई पार्क, स्मारक और अपनी मूर्तियों पर लुटाने के बाद वह अब लूट का हिसाब देने से इतनी भयभीत हैं कि प्रदेश ही नहीं पूरे देश में कानून व्यवस्था को बिगाड़ देने की बात करने लगी है। यह प्रदेश की जनता के ऐतिहासिक निर्णय का न सिर्फ अपमान है बल्कि अलोकतांत्रिक आचरण है। हकीकत यह है कि समाजवादी पार्टी ने चुनाव के दौरान और बाद में भी यह स्पष्ट कर दिया था कि वह बसपा के महापुरुषों की मूर्तियों से कोई छेड़छाड़ नहीं करेगी। मुख्यमंत्री अखिलेश ने यह जरूर स्पष्ट कर दिया था कि इन पार्को, स्मारकों में अनावश्यक जमीन घेर ली गई है उसका सदुपयोग करने की दृष्टि से वहां बाल एवं महिला अस्पताल तथा स्कूल, कालेज खोले जा सकते हैं। जनहित की योजनाओं से मायावती को क्यों परेशान होना चाहिए।
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भाई शिवपाल यदि मुहँ बंद रखें तो मुख्यमंत्री जी को बड़ी सुविधा होगी ;और बहन जी अपने बडबोलेपन से स्वयं जनता के मन से उतर जायेंगी.
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मूर्तियां तोड़ी तो बिगड़ जाएगी बात : मायावती

लखनऊ/ब्यूरो
Story Update : Sunday, April 15, 2012    12:56 AM
Mayawati warns Akhilesh Yadav from making changes in parks, statues
विधानसभा चुनावों में राज्य की सत्ता खोने के करीब एक महीने बाद बसपा सुप्रीमो मायावती शनिवार को पहली बार किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में नजर आईं।

यहां डॉ. भीमराव अंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल पर बाबा साहब की 121वीं जयंती पर उन्हें पुष्पांजलि अर्पित करने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री ने नई सरकार को दो टूक चेतावनी दी कि महापुरुषों के स्मारकों पर किसी तरह के निर्माण वह बर्दाश्त नहीं करेंगी। यदि ऐसा हुआ, तो कानून-व्यवस्था बिगड़ सकती है।

उन्होंने कहा कि बाबा साहब ने देश के करोड़ों दलितों, पिछड़ों एवं अन्य उपेक्षित वर्गों को सम्मानपूर्वक जीने का हक दिलाने के लिए जो संघर्ष किया, वह सदैव हमें प्रेरित करेगा। उन्होंने कहा कि बसपा सरकार द्वारा बनवाए गए महापुरुषों के स्मारकों व पार्कों को नई सरकार अन्य उपयोग में लाने के प्रयास करेगी, तो पूरे देश में समस्या खड़ी हो सकती है।

माया ने कहा कि बसपा शासनकाल में सपा के किसी भी महापुरुष से संबंधित स्मारक, संग्रहालय और पार्क में कोई तोड़फोड़ या निर्माण कार्य नहीं कराया गया। न ही इनकी देखरेख में लगे कर्मचारियों को हटाया गया। बसपा सरकार ने उनकी गरिमा का पूरा-पूरा ध्यान रखा। उम्मीद है कि सपा सरकार इस मामले में बसपा से सीख लेगी।

माया मंत्र
-बसपा सरकार द्वारा बनवाए गए स्मारकों व पार्कों को सपा सरकार ने छुआ तो प्रदेश ही नहीं, देश की कानून-व्यवस्था बिगड़ सकती है। स्मारकों व पार्कों को अन्य उपयोग में लाए जाने की खबरें आ रही हैं। राज्य सरकार को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए, जिससे कानून-व्यवस्था बिगड़े और उस पर संकट आ जाए।
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बाबा साहेब के सपनों को भूल गए हम
प्रकाश अंबेडकर, दलित नेता और बाबा साहेब के पौत्र
First Published:13-04-12 09:40 PM
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सामाजिक शोषण का कोई भी मसला जब हमारे सामने आता है, तो हमें बरबस ही बाबा साहेब अंबेडकर की याद आ जाती है। इस समय नक्सलवाद की समस्या को लेकर देश भर में चर्चा हो रही है। सरकार नक्सलवाद को देश की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक मानती है। देश में प्रजातंत्र है और इसके माध्यम से हर जगह, हर स्तर पर बदलाव आना चाहिए, खासकर आदिवासी इलाके में और उनके सामाजिक क्षेत्र में, जबकि हकीकत यह है कि बदलाव हमें नहीं दिखते हैं। बदलाव के नाम पर भी आदिवासियों का शोषण हो रहा है। इसी के चलते आदिवासी नक्सली विचारधारा को लेकर हमारी राजनीतिक व्यवस्था से भिड़े हुए हैं। यह टकराव सामाजिक-आर्थिक भेदभाव की वजह से है। हालात यहां तक पहुंचेंगे, इसे बाबा साहेब अच्छी तरह जानते थे, इसलिए उन्होंने संविधान में शिडय़ूल एरिया का उल्लेख किया है, जिसके तहत यह प्रावधान बना कि आदिवासी अपने क्षेत्र के मालिक खुद होंगे। इससे उनका आर्थिक-सामाजिक शोषण नहीं हो पाता। मगर सरकार ने संविधान की उस बात को लागू नहीं किया। झारखंड और छत्तीसगढ़ को आदिवासी राज्य बना दिया गया। लेकिन वहां अच्छे प्रशासन की व्यवस्था नहीं है। समाज को विकसित नहीं किया जा रहा है। एक वर्ग ऐसा है, जो हमारी संसदीय प्रणाली को विकसित करने नहीं दे रहा है। बाबा साहेब ने जो बातें कही थीं, उन पर ध्यान दिया ही नहीं गया।
वैसे कहने को आज सभी राजनीतिक दल बाबा साहेब अंबेडकर की बात करते हैं। उनके विचारों को मानने की बात करते हैं। उनकी मूर्तियां लगवाते हैं। लेकिन दरअसल वे खुद को आगे बढ़ाते हैं। बाबा साहेब के नाम पर उन्होंने अपनी छवि ही बनाई है। वरना क्या बात है कि आज भी देश में गरीबों की संख्या बढ़ रही है। उनका विकास नहीं हो रहा है। गरीबी दूर नहीं हुई है। गरीबों को रोटी नहीं मिल रही है। साथ ही दलित या ओबीसी समाज पूछता है, हमारे उत्थान के लिए क्या किया? सरकार के पास कोई जवाब नहीं है। सरकार कांग्रेस की हो या बीजेपी की हो। उसे अपनी चिंता होती है। समस्या यह भी है कि पूरे देश में कोई भी ऐसा नेता नहीं है, जिस पर जनता विश्वास कर सके। लोगों को लगे कि वह जनहित में काम कर रहा है।
बाबा साहेब ने कहा था कि धर्म की राजनीति करोगे, तो उससे राष्ट्रीय क्षति होगी। आज चारों तरफ देखि, तो लगता है कि सिर्फ धर्म की ही राजनीति हो रही है। जो धर्म की राजनीति नहीं करते, वे जाति की बात कर रहे हैं। हम बीजेपी की तरफ देखते हैं, तो वह सवर्णो की पार्टी दिखती है। मायावती की पार्टी को दलित पार्टी से ज्यादा कुछ नहीं माना जाता। कांग्रेस का भी सवर्ण चेहरा दिखता है। जो मुसलमानों को आरक्षण देने की बात न करे, उसे कभी धर्मनिरपेक्ष माना ही नहीं जाएगा। हर पार्टी जाति और धर्म को मिलाकर राजनीति कर रही है। सबसे बड़ी बात है कि राजनीति करने वाले लोग विचार से कट रहे हैं। इसके बिना तो धर्म और जाति की राजनीति हमें खोखला ही बनाएगी। यह राजनीति हमें कहीं ले नहीं जा रही, या शायद सिर्फ पीछे ही ले जा रही है।
बाबा साहेब ने कहा था कि हम जो भी राह अपनाएं, वह संसदीय प्रणाली के भीतर से ही निकलती हो। देश के सारे बड़े फैसले भी संसदीय प्रणाली में ही होने चाहिए। संसदीय प्रणाली के भीतर से जो नेतृत्व सामने आता है, उसे ही हम मानें। लेकिन हर समय ऐसा होता नहीं है। सरकार की कोशिश इसे दरकिनार करने की ही होती है। आजकल जब आम आदमी के उत्थान की बात आती है, तो लोग हमेशा नफा-नुकसान की तरफ देखते हैं। यह अपने आप में बहुत अमानवीय है। मानवीय सोच रखने वाली कोई भी सरकार ऐसा नहीं कर सकती। बाबा साहेब ने यह भी कहा था कि जो व्यक्ति राजनीति करना चाहे, उसकी समाज में मान्यता या इज्जत होनी चाहिए। उन्होंने कहा था कि राजनीतिक व्यक्ति धर्म, जाति से ऊपर उठे। अक्सर हम इस बात पर गर्व करते हैं कि हमने राजनीतिक एकता कायम कर ली है। लेकिन यह बड़ा सवाल यह है कि क्या हम सामाजिक रूप से एक हुए हैं? हमारे भीतर सामाजिक एकता अब भी कायम नहीं हुई है। सदियों पहले जो सामाजिक विभेद थे, मतभेद थे, वे आज भी कायम हैं। इन्हें पूरी तरह खत्म करने में किसी भी राजनीतिक दल की दिलचस्पी नहीं है।
जहां समाधान काफी आसान हैं, वहां भी बिल्कुल ध्यान नहीं दिया जाता। कई समस्याएं ऐसी हैं, जिनके समाधान के लिए इतना ही जरूरी है कि छोटे-छोटे राज्य बनाओ। बड़े राज्यों की समस्याएं भी बड़ी होती हैं। ऐसे राज्यों में सामाजिक समस्या और सामाजिक सांमजस्य की समस्या नहीं सुलझती। छोटे राज्य होंगे, तो एक-दूसरे से समझने की बात होगी। बड़े राज्यों में यह नहीं हो सकता। अपनेपन की बात नहीं हो सकती। हमें छोटे राज्यों के बारे में सोच साफ रखनी चाहिए थी। मायावती ने छोटे राज्यों के प्रस्ताव को आगे बढ़ाया जरूर, लेकिन बड़ा मुद्दा नहीं बनाया। अगर मायावती इसे बड़ा मुद्दा बनातीं, तो केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ता। लेकिन यह नहीं हुआ।
बाबा साहेब ने नेशनल कैरेक्टर यानी राष्ट्रीय चरित्र की बात की थी। आज हम अपने आपसे भी ईमानदार नहीं है। व्यक्तिगत निष्ठा सबसे बड़ी चीज होती है। लेकिन इसकी चिंता अब किसे है? हम भ्रष्टाचार, घूसखोरी जैसी तमाम बातों को देखते हैं, लेकिन कोई राष्ट्रीय चरित्र को बदलने की बात नहीं करता। राष्ट्रीय चरित्र बनाने की बात नहीं करता। बाबा साहेब ने इसके लिए बहुत बड़ी कोशिश की थी और इसी कोशिश में वह बौद्ध धर्म तक पहुंचे। वह मानते थे कि महात्मा बुद्ध की विचारधारा से राष्ट्रीय चरित्र बन सकता है। इसी से सामाजिक जागरूकता पैदा हो सकती है। एक-दूसरे के प्रति अच्छे विचार, प्रेम आदि सभी चीजें बुद्ध के विचार से हो सकती हैं। लेकिन देश के नेताओं ने जैसे बाबा साहेब के दूसरे विचारों को नहीं अपनाया, वैसे ही इसे भी नहीं अपनाया।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

यूपीः मंत्री के भाई, भतीजे ने मड़ई और खपरैल ढहाया


यूपीः मंत्री के भाई, भतीजे ने मड़ई और खपरैल ढहाया

आजमगढ़/अमर उजाला ब्यूरो।
Story Update : Wednesday, April 11, 2012    1:26 AM
Ministers brother nephew demolished the hut
सिधारी रेलवे स्टेशन के पास मूसेपुर गांव में मंगलवार को दबंगों ने एक परिवार का खपरैल का मकान और मड़ई ढहा दी।

कई और परिवारों के पुश्तैनी मकानों को गिराया जा रहा था कि पुलिस ने पहुंचकर काम रोकवाया। पीड़ित का आरोप है कि यह सब प्रदेश के राज्य के कैबिनेट मंत्री दुर्गा प्रसाद यादव के भाई और भतीजों ने करवाया है। पिछले तीन दिनों से मंत्री के पट्टीदारों की दबंगई से गांव में दहशत है।

दुर्गा प्रसाद यादव ने कहा कि किसी का घर गिराए जाने का मामला उनके संज्ञान में नहीं है। मूसेपुर गांव में मेरी कोई संपत्ति नहीं है। कौन क्या कर रहा है, उससे मेरा कोई वास्ता नहीं है।

सिधारी स्टेशन के पास मूसेपुर गांव के अराजी नंबर 174 में गांव के कई लोग आबाद हैं। वह करीब सौ साल से मकान बनवाकर रह रहे हैं। इसी नंबर पर कैबिनेट मंत्री के भाई गुरु प्रसाद यादव और भतीजे नरेंद्र और संतोष यादव का भी नाम दर्ज है। गांव वालों का आरोप है कि पिछले तीन दिनों से मंत्री के पट्टीदार अपने हक और हिस्से से अधिक भूभाग पर जबरन कब्जा कर रहे हैं।

मंगलवार को गांव के रामकरन यादव के सौ साल पुराने मकान को अपने हिस्से में बताकर मड़ई और दीवाल ध्वस्त कर दी गई। साथ लगते खपरैल को भी ढहा दिया। इस पर दर्जन भर ग्रामीणों ने जिलाधिकारी को प्रार्थना पत्र दे कर कब्जा रोकने और जमीन की पैमाइश कराने की गुहार लगाई। दोपहर में लगभग एक बजे सिधारी पुलिस ने मौके पर पहुंच कर उन्हें रोक।

इस संबंध में सिधारी थानाध्यक्ष ने बताया कि गांव में लोगों के घरों को गिराए जाने की शिकायत मिली थी। इस मामले में कार्रवाई की जा रही है। उधर, नवागत जिलाधिकारी प्रांजल यादव का कहना है कि यह मामला उनके संज्ञान में नहीं है। फिलहाल जांच कराई जाएगी।